प्राचार्या संदेश

 

उच्च  शिक्षण संस्थान ऐसे स्थल हैं, जहाँ से समाज कालजयी विचारों के उन्मेष की  अपेक्षा करता है |  आज समाज के समक्ष जो भी समस्याएं हैं, उन सभी का समाधान यहीं से निकल सकता है | आवशयकता है विद्यार्थियों को भारतीय परंपरा के एकात्ममानव दर्शन से  परिचित कराने की, जो कि दूसरे से नितान्त भिन्न सभी जाती धर्म और संप्रदाय के लोगो में एकता के सत्य का दर्शन कराता है | भारतीयता का यही उदान्त भाव विभिन्न विचारधारा के लोगो को कुम्भ में डुबकी लगाने के लिए खींच लाता है |

हमारा देश सदैव से शिक्षित होने के साथ साथ प्रबुद्ध  देश रहा है | वास्तविक प्रबुद्ध व्यक्ति वास्तविक और सामाजिक लक्ष्यों के प्रति निष्ठावान रहकर व्यक्तिगत हित एवं इच्क्षाओं से अप्रभावित रहकर सदैव सत्य, न्याय श्रेष्ठता के प्रति अभिनिवेश रखने वाला होता है

“यः सर्वत्रान भिस्नेहस्तत्तत्प्राय शुभाशुभम।
नाभिनन्दति द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।”

१९ वी शताब्दी के ब्रिटिश के रिकॉर्ड से पता चलता है कि १८३० के आस पास अकेले बंगाल और बिहार में  एक लाख ग्रामीण पाठशालाये थी | इस तथ्य के भी लिखित साक्ष्य हैं कि इन प्रेसीडेंसियों में ऐसा कोई कालेज नही था | गणित, ब्रह्माण्ड, आयुर्वेद, वनस्पति विज्ञान, खगोलविज्ञान,  वास्तुकला पर्यावरण ऐसा कोई क्षेत्र नही था, जिसका ज्ञान हजारों वर्ष पहले भारत में नही रहा है | ब्रिटिश शासन के समय हमारी शिक्षा पूरी तरह से ध्वस्त कर दी गयी तथा उनके आवश्यकता के पूर्ति हेतु गुलाम मानसिकता रखने वाले एक विशेष प्रकार के व्यक्तित्व निर्माण हेतु नवीन शिक्षा का सूत्रपात किया गया जो आजाद भारत में भी बिना किसी संसोधन के लागू है , जिसने हमारे देश का बहुत नुक्सान किया | इस शिक्षा का दुष्परिणाम आज सर्वत्र दिखायी देने वाली अव्यवस्था और अराजकता  के रूप में हमारे समक्ष है |

आचरण भारतीय शिक्षा का मूल है | इसलिए भारतीय परम्परा में शिक्षक को आचार्य कहा जाता है ( आचारम ग्राह्याती अचिनोति बुद्धि इति वा ) आचार्य  अपने आचरण एवं उपदेश  द्वारा विद्यार्थियों में सदाचरण सहित बुद्धी का विकास करता है | हमारे विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए , जो उनकी वर्तमान युग की आवश्यक्तायें और अपेक्षाएं पूरी करते हुए उन्हें रोजगार दिलाता हो , परन्तु पुरातन जीवन आदर्श से भी जुड़ा हो , जिससे कि संकट के समय  आने वाले विभिन्न चुनौतियों का सामना कर सकने में सक्षम हो सकें और स्वस्थ्य समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी सहभागी बन सकें |

हमारा महाविद्यालय पिछले दो-तीन वर्षों से दीप्ति संपन्न सर्जनात्मक क्षमता से युक्त निर्भयी सत्यानुरागी समाज को दिशा दे सकने में सक्षम व्यक्तित्व को गढ़ने में संलग्न है | प्राचार्या के रूप में मैंने महाविद्यालय में उच्च शिक्षण संस्थान की गरिमा के अनुकूल वातावरण और क्रियाशीलता उत्पन्न करने का संकल्प लेकर कार्य करना प्रारम्भ किया | महाविद्यालय में अनेक परिवर्तनों और नवाचार का सूत्रपात हुआ | कर्मचारियों और शिक्षकों में इससे नवीन उत्साह का संचार हुआ  और सभी इस सर्जनात्मक यात्रा सफल बनाने में सन्नद्ध हो गए | उच्च शिक्षण संस्थान के अनुरूप गरिमा और शैक्षणिक गुणवत्ता बनाये रखने एवं छात्र -छात्राओं को सर्वांगीण विकास का अवसर उपलब्ध कराने हेतु उत्साह और आवेग के साथ शुरू की गयी प्रगति का सातत्य बना रहेगा कि नहीं यह दुविधा बीच बीच में आती रही, क्योकिं कई बार इस यात्रा में अनेक कठिन चुनौतियों से सामना हुआ | मनोबल तोड़ने और इस प्रगति यात्रा से विरत करने तक की विचलन पैदा करने वाले अवरोध आये, परन्तु उत्साही और परिश्रमी कर्मचारियों और शिक्षकों के सहयोग से दृढ़तापूर्वक उन अवरोधों को दूर कर आगे बढ़ने में सफल हुए हैं |

मेरे कार्यकाल का दुसरा वर्ष पूरा हो चुका है, तीसरा सत्र चल रहा है मुझे असीम संतोष और आह्लाद का अनुभव हो रहा है कि न केवल आरम्भ किये गये परिवर्तनों की निरन्तरता बनी हुई है , बल्कि इस रफ़्तार को और गति मिली है | नए कार्यक्रमों और नयी उपलब्धियों से विकास का क्षितिज वृस्तृत हो रहा है | हम सभी परस्पर सहयोग से परिश्रम कर यह प्रयास करेंगे कि हमारा महाविद्यालय अपने स्थापना के उद्देश्यों को पूरा करते हुए अपने पुरातन गौरव को पुनः प्राप्त कर सके |

महाविद्यालय परिवार के सभी सदस्यों से निवेदन  और अपेक्षा है कि पूर्वांचल के इस गौरवशाली महाविद्यालय के पुनर्प्रतिष्ठा के लिए हम शतप्रतिशत योगदान समर्पित करें |

“संगच्छध्वं संवदध्वं
सं वो मनांसि जानताम |
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः
समन्वास्तु वो मन !
यथा व् सुसहासति |”